(मलयालम सिनेमा के व्यंग्यकार श्रीनिवासन का निधन, आम आदमी की आवाज़ खामोश Malayalam Cinema Loses Legendary Writer-Actor Sreenivasan Malayalam Cinema Loses Writer Actor Sreenivasan)
तिरुवनंतपुरम: मलयालम सिनेमा के सबसे प्रभावशाली पटकथा लेखकों और अभिनेताओं में शामिल श्रीनिवासन का 20 दिसंबर को बीमारी के कारण निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही वह रचनात्मक आवाज़ भी खामोश हो गई, जिसने दशकों तक सिनेमा के माध्यम से आम आदमी की समस्याओं, सामाजिक विडंबनाओं और राजनीतिक विरोधाभासों को सरल लेकिन तीखे व्यंग्य में प्रस्तुत किया।
कैमरे के पीछे काम करने वाले कलाकारों के लोकप्रिय होने से पहले ही श्रीनिवासन मलयालम सिनेमा में एक स्थापित नाम बन चुके थे। अभिनय में हास्यप्रिय छवि के बावजूद, उनकी असली पहचान उन पटकथाओं से बनी, जिनमें आम लोगों का जीवन, सत्ता की आलोचना और सामाजिक ढोंग को बेबाक अंदाज़ में दिखाया गया।(Malayalam Cinema Loses Writer Actor Sreenivasan)
व्यंग्य के माध्यम से राजनीति और समाज पर प्रहार
श्रीनिवासन की फिल्मों की खासियत यह रही कि वे हास्य के आवरण में सत्ता, राजनीति और सामाजिक ढांचे पर सीधा सवाल उठाती थीं। उनकी चर्चित राजनीतिक व्यंग्य फिल्म ‘संदेशम’ (Sandesham, 1994) को आज भी मलयालम सिनेमा की सबसे प्रभावशाली फिल्मों में गिना जाता है। सत्यन अंतिकाड के निर्देशन में बनी इस फिल्म में दो भाइयों के माध्यम से राजनीतिक कट्टरता और पारिवारिक तनाव को दिखाया गया।
फिल्म के संवाद, जैसे ‘पोलैंड’ से जुड़ा प्रसिद्ध संवाद, आज भी सामाजिक और राजनीतिक चर्चाओं में उद्धृत किए जाते हैं। इसमें श्रीनिवासन ने छद्म मार्क्सवादी किरदार निभाया, जबकि जयाराम ने कांग्रेस समर्थक भाई की भूमिका की।
उनकी कई फिल्मों में ट्रेड यूनियन, वामपंथी राजनीति और नौकरशाही व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए। ‘टी.पी. बालगोपालन एम.ए.’ और ‘वरवेल्पु’ जैसी फिल्मों में आम आदमी की संघर्षपूर्ण जिंदगी को केंद्र में रखा गया। ‘नरेंद्रन माकन जयकांतन वका’ और ‘ज्ञान प्रकाशन’ में स्थानीय राजनीति और श्रमिक व्यवस्था पर व्यंग्य देखने को मिला।
दिलचस्प बात यह रही कि जिस फिल्म ‘अरबीकथा’ की पटकथा उन्होंने नहीं लिखी, उसमें भी उन्होंने एक ऐसे कम्युनिस्ट की भूमिका निभाई, जो पार्टी की राजनीति का शिकार होकर खाड़ी देशों में कठिन जीवन जीने को मजबूर होता है।(Malayalam Cinema Loses Writer Actor Sreenivasan)
उच्च समाज और सिनेमा जगत पर भी कटाक्ष
श्रीनिवासन ने केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि उच्च वर्गीय समाज और स्वयं फिल्म उद्योग की भी आलोचना की। ‘गांधीनगर सेकेंड स्ट्रीट’ और ‘थलयानमंत्रम’ जैसी फिल्मों में सामाजिक दिखावे और पारिवारिक पाखंड को हास्य के माध्यम से उजागर किया गया।
फिल्म उद्योग पर उनका व्यंग्य ‘उदयनानु थारम’ और उसकी स्पिन-ऑफ ‘पद्मश्री भारत डॉ. सरोज कुमार’ में स्पष्ट दिखता है, जहां स्टार कल्चर और फिल्मी अहंकार को खुलकर निशाना बनाया गया।(Malayalam Cinema Loses Writer Actor Sreenivasan)
युवा संघर्ष और आत्मालोचनात्मक हास्य
युवाओं की बेरोजगारी और संघर्ष पर आधारित ‘नाडोडिकट्टू’ और ‘सानमानसुल्लावरकु समाधानम’ जैसी फिल्मों ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। वहीं ‘मिधुनम’ में नौकरशाही की जटिलताओं और छोटे उद्यमियों की परेशानियों को प्रभावी ढंग से दिखाया गया।
निर्देशक के रूप में श्रीनिवासन ने केवल दो फिल्में बनाईं, लेकिन दोनों में उन्होंने स्वयं को एक त्रुटिपूर्ण और हास्यास्पद चरित्र के रूप में प्रस्तुत किया। ‘चिंतावशिष्टयाया श्यामला’ में उनका किरदार आज भी दर्शकों को याद है।
उनकी पहली और सबसे चर्चित फिल्म ‘वडक्कुनोक्कियंत्रम’ को आज के मानसिक स्वास्थ्य विमर्श के संदर्भ में भी प्रासंगिक माना जाता है, जिसमें उन्होंने संदेह और मानसिक असंतुलन से जूझते व्यक्ति का संवेदनशील चित्रण किया।(Malayalam Cinema Loses Writer Actor Sreenivasan)
सिनेमा में अमिट विरासत
श्रीनिवासन की खासियत उनका आत्म-व्यंग्य और निर्भीक दृष्टिकोण था। वे जिन मुद्दों पर बोले, उनसे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उनकी रचनात्मक ईमानदारी और सामाजिक सरोकारों से इनकार नहीं किया जा सकता।
उनके संवाद, पात्र और विचार आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे। मलयालम सिनेमा ने एक ऐसे रचनाकार को खो दिया है, जिसने हास्य के माध्यम से समाज को आईना दिखाने का साहस किया।(Malayalam Cinema Loses Writer Actor Sreenivasan)
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